भगवान श्री सीताराम जी की प्रेरणा से अनेक प्राचीन प्रतियों के आधार पर लगभग दस हजार नौ सौ (10,900) वृत्तों में प्राप्त और श्रीसीताराम जी की कृपा, श्रीहनुमानजी की अनुकम्पा एवं स्वयं की गोस्वामी श्री तुलसीदास जी के श्रीचरणों के प्रति आस्था तथा अपनी सारस्वतसाधना के आलोक में परम प्रामाणिकता और विश्वसनीयता के साथ सम्पादित यह श्रीरामचरितमानसजी का तुलसीपीठ संस्करण यद्यपि मूल गुटका के रूप में जनता जनार्दन के श्रीकरी में समर्पित हो रहा था. इसी बीच इस संस्करण की पाण्डुलिपि देखकर ही स्वयं मेरे अंतर में विराजमान श्रीसीतारामजी, मेरे जीवन सर्वस्य बालक रूप श्रीरामजी, वसिष्ठानन्दवर्धन श्रीराघव सरकार, अन्जनान्दवर्धन श्रीहनुमानजी महाराज, मेरी अग्रजा श्रीराघव सरकार और आप सबकी 'बुआजी' डा. कुमारी गीतादेवी मिश्र, मेरे स्नेहथाजन श्री रमापति मिश्र वित्ताधिकारी एवं मेरे स्नेहभाजन डॉ. प्रो. रामदेव प्रसाद सिंह, पुर्वकुलपति, जे. आर.एच.यू. मेरे स्नेहभाजन डा. प्रो. वी. पाण्डेय, कुलपति, जे. आर. एच.यू. और मेरे बड़े ही अन्तरंग परिकर आयुष्मान् अशोक बत्रा, राजीवनयन लोथरा तथा मेरे श्रीमानसपरम्परा के सुयोग्य विद्यार्थी एवं श्रीराममंत्रपरम्परा के निष्ठावान् शिष्य मेरे अत्त्यंत वात्सल्यभाजन डा. ब्रजेश दीक्षित मानसमृगेन्द्र तथा मेरे श्रीमानस परम्परा के विद्यार्थी ब्राह्मण कर्मनिष्ठ डा. रामाधार शर्मा 'मानस सारभीम' आदि श्रीमानसजी पर एक भावार्थपरक सारस्वत व्याख्या लिखने का मुझसे बारम्बार सविनय अनुरोध करने लगे थे और मुझे भी श्रीमानसजी पर एक स्वस्थ भावार्थपरक संक्षिप्त व्याख्या की अनिवार्य आवश्यकता अनुभूत होने लगी थी, क्योंकि यह एक विडम्बनापूर्ण संयोग ही कह सकते हैं कि भारतेन्दु युग से लेकर अद्यावधि खड़ी बोली हिन्दी के इस विकासोन्मुख स्वर्णिम अध्याय में भी किसी सारस्वत साहित्यसेवी द्वारा श्रीरामचरितमानस की अपेक्षित सारस्वत समर्चा नहीं की जा सकी।
इस साठ वर्षीय स्वतंत्र भारत के युग में भी कदाचित् सारस्वतों पर से मैकाले की शिक्षा तथा पाश्चात्य कुलाचार्य की कृष्णछाया नहीं दूर हो पाई। प्रतिभायें यूनिवर्सिटी कहे जानेवाले आधुनिक विश्वविद्यालयों में पिंजड़निबद्ध सारिका की भौति स्वार्थपरक राजनैतिक पर्यावरण में सिमटकर रह गई है। प्रत्येक सारस्वत प्रायशः सरस्वती कमलिनी को तथाकथित धर्मनिरपेक्षता रूप हिमानी से परित्राण नहीं दिला पाया और वह दो नावों पर चढ़े हुये जलयात्री की भाँति वाम और दक्षिण विचारधाराओं में बँट गया। वर्तमान के इस आधुनिक परिवेश में श्रीराम कृष्णजी की चर्चा करना भी तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों की दृष्टि में प्रज्ञापराध भाषित होने लगा। तथाकथित प्रगतिशीलवाद के चक्रवात ने मानवमूल्यों की कल्पवल्ली को झकझोर दिया। भारतीय संस्कृति वैदेशिक सभ्यता के मार्जारीय चंगुल में फँसकर त्राहिमाम की गुहार लगाने लगी। कोई भी विश्वविद्यालयों में नियुक्त प्रोफेसर श्रीरामचरितमानस जी पर इसलिए लिखने का साहस नहीं जुटा पाया कि कदाचित उसे धार्मिक न समझ लिया जाए। भले ही वासुदेवशरण पद्यावत पर संजीवनी व्याख्या लिखकर समाज में स्वयं को धर्मनिरपेक्ष प्रस्तुत करने में सफलता पाई हो, परन्तु क्या धार्मिकता को लोकापवाद के भय से श्रीरामचरितमानसजी से दूर रहकर उन्होंने स्वरों की सरस्वती को राजमरालिका के सौभाग्य से वंचित नहीं कर दिया? आचार्य श्रीरामचन्द्र शुक्ल ने कुछ किया भी तो उन्हें प्रगतिशीलों द्वारा ब्राह्मणवाद के लांछन से लांछित किया गया। सम्प्रति विश्वविद्यालयों में इतने प्रपंच आ गये हैं कि उनसे उबर पाना आज के आचार्य, उपाचार्य तथा प्रवक्ताओं के लिये असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो गया है।
यद्यपि श्रीमानस जी पर पचासों टीकायें लिखी गई, परन्तु वे अल्पशिक्षित लोगों द्वारा या व्यासपद्धति के लोगों द्वारा लिखी जाने के कारण श्रीमानजी के शब्दों के उचित अर्थ समझने एवं समझाने में उतनी सफल नहीं हो पाई जितनी अपेक्षा गी। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि श्रीमानसजी के रथभाकाल के चार मी तैतीस वर्षों के बीतने के पश्चात् भी श्रीमानसजी का भावार्थ भी ठीक-ठीक जनता के सामने नहीं आ सका, क्योंकि इन पर सारस्वतों द्वारा मन से कोई प्रयास नहीं किया गया, लोग इस राज्य की छूने से बचते रहे। मानसपीयुष, मानसगूढार्थ चन्द्रिका, सिद्धान्ततिलक, बालबोधिनी, संजीवनी, विजया, रामेश्वरभट्टीय, गीताप्रेस आदि टीकाओं के लेखक संस्कृत में श्रम नहीं करने के कारण और अवधी भाषा की प्रकृति तथा उसके संस्कारों से सर्वचा अपरिचित होने के कारण गोस्वामी श्रीतुलसीदास जी के मन्तव्य को अपेक्षित न्याय नहीं दे पाये। अतएव श्रीसीताराम जी की कृपा से समग्र तुलसीसाहित्य का कण्ठस्यकर्ता और अध्येता हीने के साथ विश्वविद्यालयी सारस्वतपरम्परा से पूर्णतः परिचित मैं श्री मानस जी की एक व्यवस्थित सारस्वत व्याख्या प्रणीत करने का साहस जुटा पाया।
यह कटु सत्य है कि स्वातंत्योत्तर काल सारस्वती प्रतिभा के लिये दुष्काल ही सिद्ध हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वतंत्रता मिलने के पश्चात् उसके सुख में उन्मत्त होकर हम अपने करणीयों की उपेक्षा कर बैठे, किन्तु जाट वर्षों में निन्यानवे प्रतिशत विसर्ग और एक प्रतिशत सर्ग देखने में आया। धर्म और संस्कृति को अस्पृश्य मान लिया गया। परम्परा और मूल्यों को डॉग और पोंगापंथी समझकर पण्डितम्मन्यों द्वारा उनका परिहास किया गया, इसलिए स्वातंत्योत्तर काल में कारयित्री प्रतिभा के दर्शनों के लिये जिज्ञासुओं की आँखें तरस गई। इस विशंकट संकट के समय में यह मेरा एक प्रयास मात्र है। इसमें मैं कितना सफल रहूँगा यह तो भविष्य बतायेगा तथापि मैने विनम्रता के साथ अपने निरुपाधिकनिष्ठा और शास्त्रीय परिश्रम में किसी भी प्रकार का संकोच नहीं बरता है। भागवत् की भावार्थबोधिनी के रचयिता की भाँति में भी आत्मविश्वास के साथ कह रहा हूँ कि श्रीमानसजी की भावार्थदीपिका में मैंने कुछ भी अशास्त्रीय नहीं लिखा है। यह प्रयास अवश्य किया कि जनता को इस टीका के माध्यम से श्रीमानस का मूलार्थ तो समझा ही दिया जाए।
भावार्थबोधिनी में मैंने संस्कृत टीकाओं की भाँति पदों के अन्वय के अनुसार ही अर्थ उद्घाटित किया है। पहले की अपेक्षा इस समय हिन्दी समृद्ध हुई है, अब उर्दू शब्दों की प्रयोगबहुलता का युग जा चुका है, मनुष्य का मानस स्वस्थ हो गया है अतः वह सतत् खिचड़ी खाने में ही रुचि नहीं रखता उसे तो शुद्ध दाल-भात चाहिए, इसलिए हिन्दी से संस्कृत शब्दों का समन्वय तो स्वभाविक है। इसी अवधारणा से आकाशवाणी, दूरदर्शन, समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में संस्कृतगर्भित हिन्दी भाषा का विशुद्ध स्वरूप दृष्टिगोचर होने लगा है मेरी व्याख्या में इसका भी बहुत बल मिला है। जहाँ कहीं पदों के एक से अधिक अर्थों की विवक्षा हुई है वहाँ मैंने' अथवा' शब्द का प्रयोग किया है। शब्दों को खण्डशः समझाने के लिये' अर्थात ' शब्द का संकेत और कोष्टकों का भी संकेत किया गया है।
अवधक्षेत्र में जन्म के सौभाग्य ने भी श्रीमानसजी को समझने और समझाने में मेरी प्रचुर सहायता की है। शब्द योजना और भावार्थ विधान में स्वयं को संतुष्ट करने के लिये मैंने कभी-कभी गीताप्रेस की टीका और मानसपीयूष अवश्य देखा है, पर उनसे कुछ चुराया नहीं है केवल यथार्थ का समर्थन माँगा है। जैसाकि सर्वविदित् है कि गोस्वामी जी की भाषा ग्राम्य भाषा है गँवारू नहीं। वे परिष्कृत अवधी भाषा के प्रयोग शिल्पी रहे हैं उन्हें कृष्णा गौ का दूध पिलाना अभिष्ट है, परन्तु जैसे-तैसे जूठे और बिना मन के बनाये हुये पात्र में नहीं। वह एक ऐसे मृन्मय पात्र में श्याम गौ का दूध परोसना चाहते हैं जिस पर स्वर्णपात्र भी ईर्ष्या करता है। अब तक जिस पात्र में कालकूट विष, मदिरा और आमिष परोसा जाता था जिससे वह पात्र भी लांछित होता था, उसी पात्र में गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी ने तुलसीदल पधराकर एक ऐसा कालजयी अमृत परोसा जिससे वह पात्र धन्य हो गया और उस सुधा को पीकर मानवजाति धन्य हो गई तथा इस ग्रन्थ का स्पर्श करके मेरी सरस्वती पावन हुई।
सीतारामयशोमृतामललसत्कीलाललालित्यभृत् भास्वद्भारतसंस्कृतिच्छविमयं प्रेमैकसारं शुचि। सोपानैर्मुनिभिः श्रितं कविवरैः संसेवितं हंसकैः श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं वर्वर्ति भूमावधि ।। जयति कविकुमुदचन्द्रो हुलसीहर्षवर्धनस्तुलसी । सुजनचकोरकदम्बो यत्कविताकौमुदीं पिबति ।।
परिपूर्णतम परात्परपरब्रह्म परमेश्वर परमात्मा पुराणपुरुषोत्तम परतत्त्व परापराविद्याप्रतिपाद्य भगवान श्री सीतारामजी ने ही अपने सनातननि श्वासभूत भ्रमप्रमादविप्रलिप्साकरणापाटवादि पुरुषदोषरहित सनातन वेद के निगूढ़तत्त्वों की भूतार्थ व्याख्या प्रस्तुत करने हेतु अपने अंशांश पद्मयोनि ब्रह्मा जी को परमप्रत्युत्पन्न परमर्षि प्राचेतस वाल्मीकि के रूप में पुनश्च, कराल कलिकाल के कुमतिकरवाल से विलुलित, मानवीय मूल्यों से अपरिचित मानवजाति को वैदिकमार्ग पर प्रतिष्ठित करने के लिये उन्हीं महर्षि वाल्मीकि को एक ही साथ सम्पूर्ण सनातन वैदिक भारतीय वाङ्मय का भाष्य करने हेतु कविताभामिनीविलास हुलसीहृदयहुलास गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी के रूप में अपनी त्रिकालाबाधित वाङ्मयप्रतिभाप्रत्युत्पन्न संवित्शक्ति के साथ भारतवसुन्धरा पर समवतीर्ण किया।
हम जैसे अनादिकालीन वासनामलीमस कदाचारकलुषित कलिकालकदर्थित बद्धजीवों को वेदवेदान्तसारसर्वस्व परमपुरुषार्थ त्रैवर्गापवर्गातीत परमपुनीत श्रीसीतारामप्रेमपीयूष समुपलब्ध कराते हुये नवनीत कोमल सन्तहृदय सर्वभूतकरुणावशंवद परमप्रियम्वद गोस्वामी तुलसीदासजी के श्रीरामनामसुधासंधुक्षित निर्मल, निष्कलुष, निष्कलङ्क, निष्कम्प, निरुपद्रव, निर्लेप मनोव्योम में विक्रमी सम्वत् १६३१ की श्रीचैत्र रामनवमी के दिन जिस श्रीरामचरितमानसरूप त्रिकालजयी जयादित्य का प्रकाश हुआ, उसकी भास्वती प्रभा अनन्तवर्षपर्यन्त मोहनिशानिमीलित मानवताकमलिनी को विकसित करती रहेगी। आज से ४३३ वर्ष पूर्व हुलसीहर्षवर्धन गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी महाराज द्वारा उन्हीं के शब्दों में भाषाभनिति भनितिभदेस गिराग्राम्य अर्थात् अवधी भाषा में गाया हुआ निरवधि परमपुरुषार्थावधि श्रीरामभक्तिसुधासमुल्लसित श्रीरामचरितमानस आज भी उतना ही प्रासंगिक, उपयोगी, उपादेय तथा औपयिक है जितना उस समय रहा होगा अथवा उससे भी अधिक। क्योंकि ज्यों-ज्यों तापमान अधिकतर होता जाता है त्यों-त्यों रिगोतुङ्गतरङ्गा भगवती गंगाजी की निसर्गसिद्ध शीतलता की उपयोगिता अधिकाधिक होने लगती है। यह आविद्वत्पामरसिद्ध सिद्धान्त है।
प्रभु श्रीसीताराम जी के अप्रतिम कृपापात्र, क्रान्तद्रष्टा, मनीषिमौलिमणि, महाकवि महनीयकीर्ति हुलसीहर्षवर्धन प्रभु के निष्कलुष स्वान्तः सुख ने सम्पूर्ण वैश्विक सनातन सुख को समाहित कर लिया था। इसलिए उन्होंने अपने मानस के सातों सोपानों में सात्विक सनातन सुखप्राप्ति के उन सिद्धान्तों की सर्वसुलभ तथा सर्वचोधगम्य मनोहर व्याख्या प्रस्तुत की, जिन्हें बहुत पूर्व में ही भारतीय चिन्तन के मूर्धन्यमनीषी कपिल, पतञ्जलि, कणाद, गौतम, जैमिनी, बादरायण तथा देवर्षि नारद ने सांख्य, योग, वैशेषिक, न्याय, पूर्वमीमांसा, वेदान्त तथा भक्तिदर्शन के व्याज से अतिसूक्ष्मरूप में कह दिया था। अहो! आजन्म ब्रह्मचारी, कोटिकोटि परब्रह्म परमहंस परिव्राजकों के भी पूज्यचरण विरक्तचूड़ामणि श्रीरामानन्दीय श्रीवैष्णवशिरोमणि गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी महाराज के उदात्तमानस की कोटि-कोटि सिन्धुओं जैसी गम्भीरता तथा अरबों व्योममण्डलों की व्यापकता ने, मानवमात्र के मानस में उपजने वाली किंवा प्राणिमात्र के मानस में प्रतिबिम्बित होने वाली उन छोटी-बड़ी सभी समस्याओं के समाधान के ऐसे अमोघ सूत्र ढूँढ़ निकाले जिनका लोहा मानने के लिए विवश हो गया है आज का समस्त प्राच्य प्रतीच्य बौद्धिक वर्ग।
इसीलिए तो गोस्वामी तुलसीदासजी के श्रीरामचरितमानस ने एक ओर जहाँ ज्ञानदीपक प्रकरण से 'सोऽहमस्मि' जैसे वेदान्त की दुरूह ग्रन्थग्रन्थियाँ सुलझाई, वहीं दूसरी ओर' कृषी निरावहिं चतुर किसाना' कहकर छोटी से छोटी ग्रामीण समस्याओं की समाधानात्मक सरल रीतियाँ भी सुझाई। यदि गोस्वामीजी के मानस ने उत्तरकाण्ड में मानसरोगों का निदान प्रस्तुत किया तो वह' जनु छुइ गयठ पाक बरतोरा' जैसी निर्बल पक्ष की समस्या से भी अनभिज्ञ न रहा।
श्रीरामचरितमानस में मानव जीवन के सभी उतार-चढ़ाव अन्तरंग तथा बहिरंग रीति से उन्मुक्त रूप में तरंगायित हुए, जो राजमहल से झोपड़ी पर्यन्त सदैव देखे और सुने जाते रहे हैं। 'श्रीरामचरितमानस मानवमानसदर्पण है' यह उक्ति अतिरंजना नहीं प्रत्युत शाश्वत सत्य है, इसलिए दिवानिशि यन्त्रवत् चलनेवाले अविरामगति से संसरणशील इस भौतिकवादी युग में भी उत्तरी ध्रुव से लेकर दक्षिणीध्रुवपर्यन्त इस सभ्य मानवजाति का श्रीरामचरितमानस ही सम्बल बना हुआ है। 'मंगल भवन अमंगलहारी' आज भुवनमंगल का संदेश दे रही है। अतएव आज सभी पुस्तकों की अपेक्षा श्रीरामचरितमानस की सर्वाधिक माँग बढ़ी है और सबसे अधिक मानसजी की प्रतियाँ ही लोगों के उपयोग में आ रही हैं। लगभग अरबों की संख्या में श्रीरामचरितमानस पुस्तकाकार होकर लोगों की जिजीविषा का पथप्रदर्शन कर रहा है। विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय श्रीरामचरितमानस से ही प्रेरणा लेकर वैदिक हिन्दू धर्म पर अपनी निष्ठा रखे हुए हैं। मारीशस, सूरिनाम, गयाना, सिंगापुर, मलेशिया, वियतनाम, फिजी, स्विटजरलैण्ड, हालैण्ड आदि विदेशों में आज भी श्रीरामचरितमानस परम्पराबद्ध रूप से संगीतशैली में गाया जाता है। लगभग पच्चीस सौ राष्ट्रीय, प्रान्तीय, क्षेत्रीय तथा आंचलिक भाषाओं में श्रीरामचरितमानस के अनुवाद उपलब्ध है जो एक कीर्तिमान है। किं बहुना, आज श्रीरामचरितमानस से ही हिन्दी भाषा को पहचाना एवं जाना जाता है। साहित्यिक जन जहाँ अपनी जिज्ञासा को शान्त करते हैं तो आध्यात्मिक जन वहीं मानससुधा पी-पीकर अपनी आध्यात्मिक प्यास बुझा लेते हैं।
श्रीरामचरितमानस पर अद्यावधि शताधिक टीकाएँ लिखी जा चुकी है और इसी मानसकल्पवृक्ष की छाया में भक्तिसहित चर्तुवर्ग की प्राप्ति कर रहे हैं सहस्राधिक व्यासवन्धु। राजमहल से लेकर चौपालों तक अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार व्याख्यायित होती हुई यह मानसी गंगा चार शतकों से मानवीय मूल्यों की स्थापना के साथ कोटि-कोटि जनमानसों को पावन करती आ रही है।
तुलसीगिरिसम्भूता रामसागरसंगमा। एषा श्रीमानसीगंगा पुनाति भुवनत्रयम् ॥
कहना न होगा कि भगवान वेद की भाँति श्रीरामचरितमानस का स्वरूप विश्वतोमुख है। इससे प्रत्येक वैदिक सिद्धान्तानुगामी अपने-अपने सिद्धान्तों को पोषक समुचित सामग्री प्राप्त करके जन्मजन्मान्तरों के लिये श्रीमानसजी का आधमर्ण्य स्वीकार कर लेता है। वेदान्त के अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत अचिन्त्याभेद तथा द्वैत ये छहों बाद भी इसी मानस महारत्नाकर को अपना उपजीव्य मानते हैं। यद्यपि मानसजी का मुख्य प्रतिपाद्य श्रीसीताराम विशिष्टाद्वैतवाद ही है, जो जगद्गुरु श्रीमदाद्यरामानन्दाचार्य भगवान् का प्रतिपाद्य दर्शन है, क्योंकि श्रीरामचरितमानस के रचयिता अभिनव वाल्मीकि महाकवि गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज भी जगद्गुरु श्रीमदाद्यरामानन्दाचार्य भगवान् के नाती चेला अर्थात् प्रशिष्य ही तो है। यह सर्वविदित है कि, जगद्गुरु रामानन्दाचार्यजी के चतुर्थ शिष्य नरहरिदास अर्थात् नरहर्यानन्दाचार्य जी महाराज के अनन्य कृपापात्र हैं गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज। व्यासपरम्परा में भी श्रीरामचरितमानस ने कई पद्धतियों को जन्म दिया। संगतिवाद, युक्तिवाद, स्वरवाद, प्रतीकवाद एवं पदार्थवाद जैसे सिद्धान्त श्रीरामचरितमानस के ही तरलतरंग परिणाम हैं। कतिपय व्यास महानुभाव तो श्रीरामचरितमानस की एक-एक पंक्ति पर महीनों महीनों पर्यन्त अपने प्रवचन प्रस्तुत करते रहते हैं। "उठे राम सुनि प्रेम अधीरा" मानस (२.२३९.८) पर प्रस्तुत संपादकीय के लेखक मुझ अकिंचन जीव के ही १२१ घंटे प्रवचन हुए। इस कराल कलिकाल में श्रीसीतारामभक्त महानुभावों के लिए तो श्रीरामचरितमानस ही एकमात्र ध्येय, ज्ञेय, गेय तथा साधनसर्वस्व बन गया है। यहाँ इस भ्रम को निरस्त करना मैं अत्यन्त आवश्यक मानता हूँ और अनुसन्धित्सु तथा सुधीपाठकों के लिए भी बहुत उपयोगी समझता हूँ। सामान्यतः लोग दो-दो पंक्तियों को एक चौपाई मानते आये हैं परन्तु विचार करने से यह मान्यता भ्रमपूर्ण और अशास्त्रीय ही सिद्ध होती है। यदि दो दो पंक्तियों को मिलाकर चौपाई कहा जायेगा तो हनुमान चालीसा ही सिद्ध नहीं हो सकेगा क्योंकि उसमें चालीस ही पंक्तियाँ हैं जिन्हें जोड़ने पर चौपाईयों की संख्या मात्र बीस हो पाती है। इस दृष्टि से इसे 'हनुमान बीसा' क्यों नहीं कहा गया ? जबकि तुलसीदासजी ने 'हनुमान चालीसा' ही कहा है- जो यह पढ़े हनुमान चालीसा।
पद्मावत काव्य की समीक्षा लिखते हुए आचार्य श्री रामचन्द्र शुक्ल ने भी यही कहा है कि जायसी ने प्रत्येक सात चौपाई अर्थात् सात पंक्तियों के पश्चात् एक दोहा रखा है। वस्तुतः चौपाई हिन्दी का एक मात्रिक वृत्त है वार्णिक नहीं, यहाँ चौपाई का तात्पर्य चार यतियों वाले वृत्त से है। चौपाई की प्रत्येक आठर्वी मात्रा पर एक यति होती है। जिस प्रकार महर्षि वाल्मीकि जी को बत्तीस अक्षरों वाला अनुष्टुप् सिद्ध है, उसी प्रकार गोस्वामी तुलसीदासजी को बत्तीस मात्राओं वाली चौपाई सिद्ध है।
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