हिन्दी साहित्य हजार साल से अधिक की आयु व्यतीत कर चुका है। है। इस लम्बी कालावधि में उसने विकास के अनेक सोपानों को समय-समय पर स्वरूप परिवर्तन के साथ पार किया है। है। दीर्घकाल के इस साहित्य और इसके विविध रूपों को एक पुस्तक में समेट पाना कठिन ही नहीं नामुमकिन है। यही कारण है कि किसी एक आलोचना की कृति में साहित्य के कुछ मुद्दे ही सिमट पाते हैं। ऐसी स्थिति में यह देखना नितांत प्रासंगिक हो उठता है कि आलोचक ने अपनी पुस्तक में जिन मुद्दों को उठाया है उनमें कितनी तारतम्यता है और साहित्य में उनका क्या महत्त्व है। आलोचक की यही दृष्टि उसकी सफलता-असफलता का कारण बनती है।
सुधीर प्रताप सिंह की कई आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हैं। 'प्रसंगवश' उनकी नयी पुस्तक है। इस पुस्तक में सुधीर प्रताप सिंह के लिखे ऐसे सोलह आलेख हैं जो विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे और चर्चित हुए थे। मोटे तौर पर इस पुस्तक के केन्द्र में साहित्य की दो विधाएं हैं- कविता और नाटक। कुछ आलेख वर्तमान विमर्शों और साहित्यिक चिन्ताओं के संदर्भ में हैं। इस तरह यह पुस्तक साहित्य के कुछ गंभीर मुद्दों पर नए ढंग से सवाल उठाती है और उनका जवाब पाने की कोशिश करती है। पुस्तक का पहला ही आलेख है- 'आरंभिक हिन्दी कविता प्रासंगिकता का प्रश्न'। यह एक ऐसा मुद्दा है जिससे साहित्य के हर आलोचक टकराए हैं, और अपने-अपने ढंग से निराकरण किए हैं। सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य, जैन साहित्य आदि आरंभिक हिन्दी कविता के ऐसे रूप हैं जिनको साहित्य में शामिल करने के मुद्दे पर साहित्यकार एकमत नहीं हैं। देशी भाषा काव्य और विद्यापति या खुसरो का रचना संसार तो बाद की बात है। सुधीर प्रताप सिंह अपने इस आलेख में इन मुद्दों से भलीभांति टकराते हुए एक निश्चित पथ के संधान की कोशिश करते हैं। गिरिधर कविराय हिन्दी के ऐसे कवि हैं, जिनकी चर्चा साहित्य में कम हुई है पर लोक में उनकी कविता की व्याप्ति भरपूर है। एक आलेख में यहां गिरिधर कविराय से जुड़े अनेक संदर्भों को रेखांकित किया गया है।
हिन्दी नाटकों का व्यवस्थित आदि स्वरूप एक तरफ तो भारतेन्दु के नाटकों में दिखाई देता है, तो दूसरी तरफ नाटक के लोक प्रचलित स्वरूप 'नौटंकी' में। देश- दुर्दशा, देश की पुनर्खेज और समसामयिक समस्याएं हिन्दी नाटकों का प्रिय विषय रहा है। भारतेन्दु के नाटक 'प्रेमयोगिनी' के माध्यम से सुधीर प्रताप ने काशी केन्द्रित साहित्य की अच्छी पड़ताल की है। हिन्दी नाटकों के लोक प्रचलित स्वरूप पर 'इन्दरसभा' का विशेष प्रभाव पड़ा है। इस प्रभावों को नौटंकी में बखूबी देखा जा सकता है। नौटंकी विधा में 'सुल्ताना डाकू' का विशेष महत्त्व है। लोक रंगमंच की जानकारी रखने वाले इस नौटंकी की लोकप्रियता से अपरिचित और अनजान नहीं हैं। 'प्रतिरोध का स्वर-सुल्ताना डाकू' शीर्षक आलेख में सुधीर प्रताप ने इस नौटंकी में अभिव्यक्त प्रतिरोध के स्वर को पकड़ने का गंभीर प्रयास किया है।
हिन्दी में आजकल दलित और स्त्री विमर्श पर विशेष चर्चा हो रही है। पुस्तक में इन विमर्शों और उनसे जुड़े साहित्य पर भी आलेख हैं। इसी तरह से हिन्दी का स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम और मीडिया की स्थिति पर भी गंभीर चर्चा है।
सब मिलाकर पुस्तक प्रासंगिक और गंभीर है। निश्चय ही साहित्य के पाठकों के लिए यह उपयोगी होगी और बहस के कुछ नए मुद्दों को उभारने में सहायक होगी।
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