वर्तमान दौर उपभोक्तावादी संस्कृति की गिरफ्त में है। यहाँ 'उत्पादन-उपभोग' के संबंध का बड़ा लचीला और करतबी नियम देखने को मिलता है। यही स्थिति कला और साहित्य के साथ भी है। साहित्य के समाजशास्त्री कला और साहित्य की कृतियों को सामाजिक उत्पादन मानते हैं। इस हिसाब से कहानी की कोई किताब या उपन्यास एक सामाजिक उत्पादन है। दूसरी तरफ, फिल्म भी न केवल सामाजिक उत्पाद है, बल्कि इसका लक्ष्य भी समाज ही है, पैसा कमाने से लेकर सामाजिक संदेश देने तक। कोई रचनाकार साहित्य रचना स्वान्तःसुखाय भी कर सकता है, किन्तु किसी फिल्मकार के लिए ऐसी बात बेमानी मानी जाती रही है। ऐसे में जब कोई फिल्म निर्माता किसी साहित्यिक कृति को आधार बनाकर फिल्म निर्माण करता है, तब उसका उद्देश्य या तो साहित्यिक रचना की लोकप्रियता को भुनाना होता है या वह साहित्यिक रचना के बरक्स श्रेष्ठ मूल्यों एवं नये प्रश्नों को समाज के सम्मुख रखने का प्रयत्न करता है। फिल्मकार का उद्देश्य उपर्युक्त दोनों में से कुछ भी हो, लेकिन वह वर्तमान दौर की सामाजिक-वैचारिक आर्थिक-राजनीतिक सघनता से प्रभावित अवश्य होता है।
वर्तमान दौर का हिन्दी सिनेमा भूमण्डलीकरण, उपभोक्तावाद, बाजारवाद और उत्तर आधुनिक संदर्भों से बना और प्रदर्शित हुआ, ठीक उन्हीं संदर्भों में दर्शकों ने इन फिल्मों को पसंद-नापसंद किया। यानी, वर्तमान दौर का हिन्दी सिनेमा क्रमशः राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक परिप्रेक्ष्य से गुजरता हुआ आज की स्थिति में रचनात्मकता के विविध आयामों को प्रस्तुत कर रहा है।
साहित्य की भाँति फिल्म भी स्वप्न और रचनात्मकता का संगम है। साहित्य में यह संगम शब्दों के माध्यम से होता है, तो फिल्म में तस्वीरों के माध्यम से। तस्वीरों के माध्यम से स्वप्न और रचनात्मकता को आकार देने में सफलता 19वीं सदी के अन्तिम दशक में मिली। इस सफलता के बाद फिल्म ने अपने विकास के कई चरणों को पार किया है और कई मुकाम अभी उसे पाने हैं। एक सदी से अधिक के अपने लम्बे सफर में फिल्म से काफी उम्मीदें की गई। वह कभी उम्मीदों पर खरी उतरी तो कभी असफल भी हुई। कभी इसे क्रान्ति माना गया तो कभी सांस्कृतिक पतन के लिए भी जिम्मेदार ठहराया गया। हर दौर की स्वप्नजीविता को फिल्म ने अभिव्यक्त किया। जब भी नई पीढ़ी आई, जब भी नए कौशल सामने आए, जब भी तकनीकी प्रयोग की सुविधाओं का विस्तार हुआ, फिल्म ने उन दिशाओं में ढलकर नया रूप धारण कर लिया।
फिल्म को भी साहित्य की भाँति समाज का आईना कहा जाता है। जिस प्रकार साहित्य अपने समय और समाज से गहरे अर्थों में प्रभावित होता है, उसी प्रकार फिल्म भी। फिल्म और साहित्य के बीच बुनियादी रूप में बिम्ब और शब्द का संबंध होता है। बिम्ब से ही दृश्य का निर्माण होता है। इस आधार पर साहित्य, शब्दों तथा उनके समुच्चय में निहित अर्थों का माध्यम है और फिल्म दृश्यों का। फिल्म में फिल्मकार साहित्यिक शब्द का दृश्यगत रूपान्तरण करता है। शब्द, अर्थ और दृश्य की अंतर्निर्भरता के कारण ही साहित्य और फिल्म एक-दूसरे के इतने करीब आ जाते हैं।
साहित्य और फिल्म का बुनियादी संबंध है। फिल्म के विकास क्रम में साहित्य का बहुत बड़ा योगदान है। फिल्म का आधार साहित्य होता है, क्योंकि बुनियादी रूप में उसमें कथा, घटनाएँ, पात्र और संवाद होते ही हैं। वैसे फिल्म को एक सामूहिक कला माना जाता है। यह एक ऐसा कला-कोलाज है, जिसमें एक ही साथ कई कलाओं का समावेश है। फिल्म को न तो साहित्य से अलग करके देखा जा सकता है और न ही. संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला, पेंटिंग, अभिनय और नृत्यकला से। साहित्य के साथ इन सब कलाओं के संबंध और संयोग से ही फिल्म का निर्माण होता है।
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