गरीबी से जूझते हुए एक युवा पति-पत्नी की झिंझोड़कर रख देने वाली ऐसी कहानी, जिसके कारण सामाजिक ताने-बाने पर कठोर चोट पड़ती है।
लोकप्रिय उपन्यासकार दत्त भारती ने अपने इस मार्मिक उपन्यास में समाज में धीरे-धीरे शामिल हो रही कुरीतियों को आधार बनाया है। इसकी कहानी पाठक को सोचने के लिए विवश करती है और साथ ही गर्त की ओर अग्रसर समाज का यथार्थवादी चित्त्रण दर्शाता है कि हम विकास नहीं विनाश की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
यह उपन्यास स्वयं में एक प्रयोग है। प्रयोग इस दृष्टि से कि यह उपन्यास तथाकथित सभ्य समाज की एक ऐसी झलक दर्शाता है, जहाँ मान-मर्यादा कुछ महत्व नहीं रखती, अगर वहाँ कुछ महत्व रखता है तो वह है धन।
धन के लिए मनुष्य किस स्तर तक गिर सकता है यह इस उपन्यास में स्पष्ट किया गया है।
आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि, नाटककार और सामाजिक विचारक दत्त भारती ने कहानी, कविताओं और लेखों के अलावा कई सौ उपन्यास लिखकर साहित्य में अपना एक अलग विशिष्ट स्थान बनाया है। घर और स्कूल से प्राप्त आर्यसमाजी संस्कार, विश्वविद्यालय का साहित्यिक वातावरण, देशभर में होने वाली राजनैतिक हलचलें, बाल्यावस्था में आर्थिक संकट इन सबने आपको अति संवेदनशील, तर्कशील और विचारक बना दिया, जो आपके लेखन का आधार बना। आपको समाजसेवा एवं लेखन के लिए कई पुरस्कार भी मिले हैं।
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