चिकित्सा शास्त्र बिना ध्यान के सदा ही अधूरा रहेगा। हम बीमारी ठीक कर देंगे, बीमार को ठीक न कर पाएंगे। आदमी का एक ही छोर हमारे खयाल में है और इसलिए धीरे-धीरे हमने शरीर की बीमारियां तो कम कर ली है और मन की बीमारियां बढ़ती चली गई हैं।
और उस दिन चिकित्सा-शास्त्र पूरा हो सकेगा, जिस दिन हम आदमी के भीतरी छोर को भी समझ लें और उसके साथ भी काम शुरू कर दें। क्योंकि मेरी अपनी समझ ऐसी है कि भीतरी छोर पर वह जो बीमार आदमी बैठा हुआ है, वह हजारों तरह की बीमारियां बाहर के छोर पर भी पैदा करता है।
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