प्रभात रञ्जन सरकार : संक्षिप्त परिचय
श्री प्रभात रंजन सरकार ने जमालपुर (बिहार) के एक मध्यवर्गीय परिवार में सन् 1921 में बुद्ध पूर्णिमा के दिन जन्म लिया। हाई स्कूल की पढ़ाई के लिये वे कोलकाता गये। सन् 1940 में वहाँ के विद्यासागर कॉलेज से आई.एस.सी. (इण्टर मीडिएट) करने के बाद अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करने के लिये जमालपुर लौट गये और वहाँ रेलवे वर्कशॉप के लेखा विभाग को अपनी सेवायें देने लगे। सन् 1955 में आप ने सम्पूर्ण चर-अचर जगत् के हित को ध्यान में रख कर आनन्द मार्ग नामक सर्वथा मौलिक, विप्लवी तथा अभूतपूर्व दर्शन का प्रतिपादन किया और अपने दार्शनिक विचारों के प्रसार प्रचार के लिये आनन्द मार्ग प्रचारक संघ की स्थापना की। संगठन की तेज रफ्तार से बढ़ती हुई लोकप्रियता को देखते हुये आपने अपना पूरा जीवन अपने आदर्श के प्रचार प्रसार के लिये समर्पित कर दिया। पूरे विश्व में फैले हुये आपके अनुयायी आपको सद्गुरु मानते हैं और आप को आप के लौकिक नाम से नहीं वरन् श्री श्री आनन्दमूर्ति के नाम से जानते हैं। भक्तगण आपको सम्मान और प्रेम की भावना से अभिभूत होकर बाबा कह कर सम्बोधित करते हैं।
आनन्द मार्ग दर्शन के दो पक्ष है आध्यात्मिक दर्शन और प्रगतिशील उपयोग तत्व (प्रउत) नामक सामाजिक-आर्थिक सिद्धान्त। आध्यात्मिक दर्शन में आप ने वेद के ज्ञान काण्ड (उपनिषद) की शिक्षा, भगवान् शिव द्वारा प्रदत्त तांत्रिक जीवन पद्धति और भगवान् श्री कृष्ण के योग और अन्याय के विरूद्ध संघर्ष करने की भावना को समाहित किया है जिसके अनुसार धर्म आन्तरिक प्रक्रिया है। बाहरी आडम्बर से धर्म का कोई लेना-देना नहीं है। तिल में तेल की तरह परमपिता परमात्मा हमारे मन में विराजमान हैं। आध्यात्मिक साधना के द्वारा उनकी अनुभूति करना ही धर्म है और इसी में मानव जीवन की सार्थकता है।
प्रउत भी अध्यात्म की ठोस बुनियाद पर आधारित है। जो कि पूँजीवाद और साम्यवाद का व्यवहारिक विकल्प प्रस्तुत करता है। प्रउत के अनुसार प्रत्येक व्यष्टि को समाज में सिर ऊँचा उठाकर और सीना तान कर सम्मानजनक तरीके से जीने का अधिकार है और जब तक देशवासियों की न्यूनतम आवश्यकताओं (भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और चिकित्सा) की पूर्ति नहीं हो जाती तक वे सम्मानजनक तरीके से नहीं जी सकते इसलिये राजनीतिक व्यवस्था और प्रशासन तंत्र को अपने देशवासियों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही चाहिये। जो व्यवस्था अपने देशवासियों को इस जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित करती है उस व्यवस्था को बदलने के लिये उस का विरोध करना, जन चेतना जागृत कर के उस के खिलाफ विद्रोह करना और इस तरह शोषणविहीन आर्दश समाज व्यवस्था की स्थापना के लिये प्रयत्नशील रहना समाज के जागरूक नागरिकों और शुभचिंतकों का कर्तव्य है। प्रउत की ऐसी विप्लवी विचारधारा से डर कर आपका और आप के संगठन का विश्वव्यापी स्तर पर घोर विरोध किया गया। इसी क्रम में सी बीआई ने आपके विरुद्ध मनगढन्त आरोप लगाकर 29 दिसम्बर 1971 में आप को गिरफ्तार कर के पटना स्थित कारागार में बंद कर दिया गया। सिर्फ इतना ही नहीं वरन 12 फरवरी 1973 को जेल में ही दवा के नाम पर प्राणघातक विष दे कर आप की हत्या करने का कुत्सित प्रयास भी किया गया। आध्यात्मिक शक्ति के प्रयोग से आप ने खुद को विष के प्रभाव से बचा लिया। फिर आप ने अपने व्यक्तिगत सचिव के माध्यम से भारत सरकार के सर्वोच्च अधिकारियों, सयुक्त राष्ट्रसंघ और एमनेष्टी इन्टरनेशनल से उस जघन्य अपराध की लिखित शिकायत कर के उस की न्यायिक जाँच की माँग की। उसी माँग को लेकर 1 अप्रैल 1973 से आप ने जेल में रहते हये अनिश्चितकालीन अनशन प्रारंभ कर दिया। पटना जेल के दस्तावेज यह प्रमाणित करते हैं कि अपनी माँग को मनवाने के लिये आप लगातार पाँच वर्ष चार महीने और दो दिन तक अनशन करते रहें। इस बीच आप की निःशर्त रिहाई की माँग को ले कर देश-विदेश में कार्यरत आप के नौ अनुयायों ने नई दिल्ली (भारत) मनीला (फिलिप्पीन्स), बर्लिन (जर्मनी), डल्लास (अमरिका) और जेनेवा (स्विटजरलैंड) में आत्मदाह भी किया लेकिन उन सारे प्रयासों का कोई नतीजा नहीं निकला जिससे यह प्रमाणित होता है कि पूरी दुनिया की राजनीति पर स्वार्थी और धर्म-विरोधी शक्तियों का आधिपत्य है। अन्ततः धर्म की विजय हई और 2 अगस्त 1978 को पटना हाई कोर्ट ने आप की सम्मानजनक रिहाई का आदेश दिया। जेल में बंदी जीवन के दौरान जेल में बंदी जीवन के दौरान भी अपने अनुयायियों के सहयोग से आप अपने संगठन का प्रसार करते रहे। रिहा होने के बाद अपने आदर्श के प्रचार के लिये आप ने ताईवान, बैंकाक, फिलिप्पीन्स, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड, जेमेइका, स्विट्जरलैण्ड, नार्वे, डेनमार्क, स्वीडन, इज्राइल और वेनेजुएला का दौरा भी किया।
श्री प्रभात रजन सरकार द्वारा दिये गये आध्यात्मिक प्रवचनी और सामाजिक व्याख्यानों के चुने हये उद्दरणों को अवधुतिका आनन्द मित्रा आचार्या ने "दि थाट्स ऑफ पी. आर. सरकार" नामक पुस्तिक में संकलित किया था। उसका पहला संस्करण सन् 1981 में छपा था उसके बाद इसके चार संस्करण छप चुके हैं। इस पुस्तिका के बहु प्रतीक्षित हिन्दी संस्करण को प्रस्तुत करते हये हमें अपार हर्ष हो रहा है। हिन्दी अनुवाद आचार्य अनिमेषानन्द अवधूत ने किया है। बदले हुये परिवेश को देखते हये उन्होंने पुस्तिका में कुछ नये उद्धरण और "कीर्तन "इतिहास' वेद और तन्त्र", "नव्यमानवतावाद" और "श्रीकृष्ण महाभारत और गीता जैसे पाँच नये अध्यायों का समावेश भी किया है। टाइपिंग आचार्य उत्यागानन्द अवधूत ने किया है। आवरण पृष्ठ और पुस्तक की रूपरेखा राम सन्देश कुमार ने किया है। विषय वस्तु के सम्पादन, वाक्य विनियास और भाषागत त्रुटि में सुधार का महत्वपूर्ण कार्य आचार्य किशन सूद, नरेन्द्र राजपुरोहित और निखिल कुमार अग्रवाल ने किया है। प्रकाशन विभाग इन सभी महानुभावों का आभारी है।
हम एक अनोखे युग में जी रहे हैं। एक तरफ विज्ञान की चमत्कारिक उपलब्धियाँ हैं और दूसरी तरफ हैं नैतिक पतन की पराकाष्ठा को भुगतने के लिये मजबूर सृष्टि का सर्वोच्च विकाश कहलाने वाला मनुष्य। एक तरफ शहरों की चकाचौंध में डूबी गगनचुम्बी इमारतें हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि स्वर्ग धरती पर उतर आया है। दूसरी तरफ झुग्गी-झोंपड़ी और ग्रामीण इलाकों में नरक से भी भयानक और अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर और भूखे पेट सोने वालों की संख्या भी करोड़ों में है। सारी दुनिया में आज भ्रम, भय और अनिश्चय का वातावरण व्याप्त है। एक के बाद एक दो दो महायुद्ध की विभीषिका झेलने के बाद जब राजनीतिक विष्लेषक तीसरे विश्व युद्ध को अवश्यम्भावी मानते हैं तो जन साधारण ही नहीं वरन् बौद्धिक वर्ग भी काँपने लगता है।
सम्पूर्ण मानवजाति को विनाश की खाई में धकेलने को आतूर इन विषम परिस्थितियों का एक मात्र कारण है मानव जीवन की समस्त समस्याओं का यथार्थपरक और व्यवहारिक समाधान प्रस्तुत करने वाले दर्शन का अभाव। राजनीति के क्षेत्र में हम गणतान्त्रिक देश के निवासी होने का दिंढोरा पीटते हैं। अर्थनीति की बात कि जाये तो हमारी समाज व्यवस्था पूरी तरह पूँजीवाद पर आधारित है। व्यक्तिगत जीवन में अधिकांश लोग बुरी तरह भ्रमित हैं। धर्म के नाम पर उपनिषद् की "अहम् ब्रह्मास्मि' जैसी उदात विचारधारा को भूल कर बाहरी आडम्बर में ही डूबे हुये हैं और उसी को अपने जीवन का आदर्श मान बैठे हैं। इन्हीं सब कारणों से आत्महत्या करने वालों और मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। परिवार बिखरने लगे हैं। राजनीति भ्रष्टाचार का अड्डा बनकर रह गयी है। सारांश यह है कि एक सुस्पष्ट और व्यवहारिक दर्शन अर्थात् आदर्शनिष्ठ विचारधारा के अभाव में लोगों का जीवन दिशाविहीन कटी पतंग की तरह भटक कर रह गया है। हमारा विश्वास है कि आनन्द मार्ग दर्शन व्यष्टिगत और समष्टिगत जीवन में व्याप्त वैचारिक शून्यता को दूर करेगा और बेहतर समाज की स्थापना के लिये प्रयत्नशील संगठनों, नव युवकों और समाज के शुभचिन्तकों को आनन्द मार्ग दर्शन से संकलित अभिनव विचारों का यह गुलदस्ता सकारात्मक योगदान देगा।
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