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पंडित मदनमोहन मालवीय सिद्धिसदन थे, महामना थे। दूसरे गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन जाते हुए उनके बारे में महात्मा गांधी ने जहाज पर लिखा, 'मैं तो मालवीय जी महाराज का पुजारी हूं। मालवीय जी के दर्शन मैंने सन् १८९० के साल में चित्र द्वारा किया था, वह चित्र विलायत में इंडिया पत्र में था। जिसे मिस्टर डिगबी निकालते थे। वहीं छवि मैं आज भी देख रहा हूं। जैसे उनके लिबास में, ऐसे ही उनके विचार में ऐक्य चला आया है और इस ऐक्य में मैंने माधुर्य और भक्ति पाए हैं। आज मालवीय जी के साथ देशभक्ति में कौन मुकाबला कर सकता है ?... यह नरवीर हमारे लिए दीर्घायु हो।' यह बात ७सितंबर, १९३१ की है। महात्मा गांधी की एक अनोखी तस्वीर है, जिसमें उनके ललाट पर तिलक है। यह तस्वीर जहाज पर सवार होने से पहले की है। उस जहाज पर गांधी जी के साथ महामना मालवीय जी भी लंदन के लिए सवार हुए।
इस प्रसंग का उल्लेख यहां इसलिए जरूरी है कि देश-दुनिया को यह जानना चाहिए कि जिसे महात्मा गांधी पूज्य मानते थे, वे पंडित मदनमोहन मालवीय थे। जिन्हें इतिहास की धूल-मिट्टी में दवा ही दिया गया था। क्या ऐसा संभव है? राज्य से उपेक्षित होना एक बात है और समाज की स्मृति में बने रहना बिल्कुल दूसरी बात है। यही बात महामना के साथ घटित हुई है। पंडित मदनमोहन मालवीय 'महामना' थे। इस उपाधि से उन्हें राज्य-व्यवस्था ने विभूषित नहीं किया था, यह सम्मान तो उन्हें समाज से प्राप्त हुआ था। डॉ. संपूर्णानंद ने सही लिखा है कि महामना वही व्यक्ति हो सकता है, जिसका संकल्प सदा महान और लोक कल्याण की भावना से परिपूर्ण हो। महामना का अर्थ है, ऊंचा और उदार मन वाला। मालवीय जी हर दृष्टि से महामना थे।
क्या यह संयोग है? कैसा संयोग है? संयोग के प्रश्न में दो बातें हैं। महामना के जीवनकाल में उन पर पुस्तकों के प्रकाशित होने का क्रम निरंतरता में मिलता है। यह पहली बात है। इसी का संबंध दूसरी बात से है, वह यह कि उनके निधन के बाद उन पर केंद्रित कुछ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। लेकिन इन पुस्तकों से वह अभाव दूर नहीं होता, जो पंडित मदनमोहन मालवीय संपूर्ण वाड्मय से हो सकता है। एक संयोग घटित हुआ, २४ अप्रैल, २०१४ को। जिसे देश की जनता ने अपने मन में प्रधानमंत्री के रूप में बैठा लिया था, वे नरेंद्र मोदी, जो अपना पर्चा दाखिल करने से पहले काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर पहुंचे। वहां महामना की मूर्ति है। नरेंद्र मोदी ने मालवीय जी की मूर्ति को माला पहनायी। उनके चरण छुए। इस तरह महामना का आशीर्वाद लिया। वह राजनीतिक घटना है। इसकी प्रतीकात्मकता में चिंतन की एक सुनिश्चित दिशा है। इस अर्थ में यह सुखद है और बोधप्रद है। वह वास्तव में इतिहास बोध है, जिसमें भविष्य की दृष्टि भी है।
इस घटना ने महामना को इतिहास की अनंतता में स्थापित किया। जिन्हें विस्मृत किया गया था, उन्हें पुनःपुनः स्मरण का वह प्रयास था। याद करना चाहिए कि मालवीय जी को पूरे मन से स्मरण का यह प्रयास तभी से शुरू हुआ। यह भी याद करने योग्य है कि यह घटना मालवीय जी के निधन के ठीक ६८ साल बाद घटित हुई। क्या इस घटना से पंडित मदनमोहन मालवीय वाड्मय की राह खुली ? इसी से यह प्रश्न भी पैदा होता है कि क्या वह राह बंद थी? इन प्रश्नों की भूल भुलैया बड़ी है। उसमें भटकने के बजाए यह दर्ज किया जाना जरूरी है कि अनेक अवसर आए, जब पंडित मदनमोहन मालवीय वाङ्मय पर कार्य शुरू हो जाना चाहिए था। एक अवसर विशेष था। वह मालवीय जी का जन्मशताब्दी वर्ष था। १९६१ का वह वर्ष था।
तब महान अध्येता डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के संपादकत्व में 'महामना श्री पण्डित मदनमोहन जी मालवीय के लेख और भाषण (भाग १ धार्मिक)' शीर्षक से ३४० पृष्ठों का एक ग्रन्थ अखिल भारतीय मालवीय जन्मशती समारोह समिति, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्रकाशित हुआ। जिसमें मालवीय जी के कुल २८ लेख और भाषण संकलित हैं। इस ग्रन्थ की भूमिका में वासुदेवशरण जी ने लिखा है, 'इस संकलन में जो लेख या भाषण आये हैं, वे तो मालवीय जी रूपी समुद्र की केवल एक बूंद के समान हैं। मालवीय जी ने कितना सोचा, कितना कहा और कितना किया- इसका लेखा-जोखा असंभव-सा है। उन्हीं की प्रेरणा से प्रकाशित 'सनातनधर्म' नामक साप्ताहिक के लिए उन्हें यदा-कदा जो लिखना पड़ा, वे लेख मालवीय जी की साहित्य-रचना के स्वल्पांश ही हैं। वे जो कुछ कहते, वह साहित्य ही होता था।'
क्या उस समय वृहद योजना बनी थी? वह क्या थी? इन प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास विफल रहा। अगर कोई योजना बनी थी, तो वह योजना ठण्डे बस्ते में चली गई, आखिर क्यों? इसका उत्तर कठिन है। समय ने उसे ढक लिया है। ये प्रश्न इसलिए उठते हैं क्योंकि भाग-१ प्रकाशित हुआ, तो भाग-२ का क्या हुआ? क्या वह प्रकाशित नहीं हुआ? इसका स्पष्ट उत्तर दिया नहीं जा सकता क्योंकि बहुत तलाश करने के बावजूद डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा सम्पादित ग्रन्थ का दूसरा भाग कहीं भी प्राप्त नहीं हो सका और न ही किसी पुस्तक में इसका कोई उल्लेख ही मिलता है। इसलिए यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि केवल प्रथम भाग ही प्रकाशित हुआ था। जून, १९६२ में मालवीय जी के भतीजे (पं. जयकृष्ण मालवीय के सुपुत्र) पं. पद्मकांत मालवीय के सम्पादकत्व में 'मालवीय जी के लेख' शीर्षक से उनके ७५ हिन्दी-लेखों का संकलन प्रकाशित हुआ, जिसके सभी लेख 'अभ्युदय' के प्रारंभिक काल के अंकों से लिए गए थे। यह ग्रंथ २८२ पृष्ठों का है। इसे नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली ने प्रकाशित किया है, जिसकी प्रस्तावना तत्कालीन राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी ने लिखी है। ये सभी ग्रन्थ लम्बे समय से अप्राप्य हैं।
वर्ष २००४ में उमेशदत्त तिवारी ने 'महामना के भाषण' और 'महामना के लेख' शीर्षक से दो ग्रन्थ प्रकाशित कराए। इन दोनों ग्रन्थों का प्रकाशन महामना मालवीय फाउण्डेशन, वाराणसी से हुआ है। वर्ष २००७ में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 'महामना के विचार एक चयन' ग्रन्थ का प्रकाशन कराया गया। वह तृतीय अन्तरराष्ट्रीय पूर्व-छात्र समागम का अवसर था, जिसे प्रो. अवधेश प्रधान ने मालवीय जी के १८ लेखों और भाषणों का संकलन कर निकाला था। वर्ष २०१३ में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने मालवीय जी के ५१ लेखों और भाषणों का संकलन 'मदनमोहन मालवीय विचार-यात्रा' शीर्षक से प्रकाशित किया। इसके सम्पादक प्राध्यापक समीर कुमार पाठक हैं। उनकी मालवीय जी पर एक दूसरी पुस्तक भी है। वह है 'मदनमोहन मालवीय नवजागरण का लोकवृत्त'। इन ग्रन्थों के अलावा मालवीय जी के समस्त लिखित और वाचिक, प्रकाशित और अप्रकाशित सामग्री को सहेजने का योजनापूर्वक प्रयास नहीं हुआ। यह बात कहनी जरूरी है।
मालवीय जी के जीवनकाल में और उसके बाद अभी हाल तक उनके जो रचना-संचयन प्रकाशित हुए हैं, उनमें घुमा-फिराकर एक ही प्रकार की सामग्री का प्रकाशन होता रहा है। जो कुछ अब तक प्रकाशित हुआ है, वह अनुमानतः मालवीय जी के कुल साहित्य का पांचवां हिस्सा भी नहीं है। इसका अर्थ स्पष्ट है कि बहुत बड़ा हिस्सा अब तक अपनी खोज की प्रतीक्षा में था। वह विभिन्न अभिलेखागारों में विद्यमान है। यह एक तथ्य है कि मालवीय जी के साहित्य के संकलन और प्रकाशन का निर्णय भारत सरकार ने कभी नहीं किया। अवश्य, २०११ में भारत सरकार ने महामना मदनमोहन मालवीय को रस्मी तौर पर याद किया। वह मालवीय जी की १५०वीं जयंती का वर्ष था।
अब तक मालवीय जी का पूरा साहित्य क्यों नहीं प्रकाशित हो सका? यह प्रश्न गहरा है। इसकी गहराई में जितने उतरेंगे, उतने बड़े और पीड़ादायी प्रश्न उभरते चले जाएंगे। इस पीड़ा से देश-समाज मुक्त हो सके, इसके लिए एक बड़े संकल्प की जरूरत थी। वह संकल्प महामना मालवीय मिशन ने लेकर अपनी सार्थकता सिद्ध की। मालवीय जी का साहित्य खोजा जा सके, इसका मिशन ने बीड़ा उठाया। सोचिए, मालवीय जी के जाने के बाद कितने वर्ष गुजर गए हैं। देर से ही, पर यह एक बड़ा निश्चय है। इसे लोग मानेंगे भी। मई, २०१८ में महामना मालवीय मिशन की कार्यसमिति ने महामना मदनमोहन मालवीय वाङ्मय पर कार्य करने की एक योजना स्वीकार की। इसके लिए वाड्मय केन्द्रीय कार्यान्वयन समिति बनाई गई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अग्रणी पुरुष डॉ. कृष्णगोपाल ने मिशन के नेतृत्व को प्रेरित और प्रोत्साहित किया। इतना ही नहीं, उन्होंने इस कार्य को अपनी प्राथमिकता में रखा। जब-जब कठिनाइयां उत्पन्न हुई, तब-तब डॉ. कृष्णगोपाल जी का सहारा मिला। पूरी योजना का उन्होंने मार्गदर्शन किया। संयोजन का दायित्व हरिशंकर सिंह ने संभाला, जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पुराने छात्र भी हैं। देश के कोने-कोने से अनेक विद्वान् और मालवीय जी के प्रति श्रद्धावान समूह ने गोवर्धन पहाड़ सरीखी इस परियोजना में अपना बल लगाया।
स्वाधीनता संग्राम के आकाश पर महामना पंडित मदनमोहन मालवीय (१८६१-१९४६) चमकते सितारे हैं। उनका संपूर्ण जीवन हिन्दुत्व और भारतीयता का एक सुंदरतम गीत है जिससे राष्ट्रीयता की एक अविरल धारा निकलती है। वे उस धारा के भगीरथ थे। इसे समझने के लिए यह जानना चाहिए कि १८८४ में मालवीय जी ने 'मध्य हिन्दू समाज' नाम से दशहरे के अवसर पर बड़े धूम-धाम से उसका उत्सव किया। उसमें उत्तर भारत के बड़े-बड़े विद्वान उपस्थित हुए थे और काफी चहल-पहल थी। उत्सव तीन दिनों तक यमुना के किनारे मनाया गया था। तब उनकी आयु मात्र २३ साल थी। इसे एक उदाहरण से जाना जा सकता है कि उनका संकल्प जितना गहरा था, उतना ही ऊंचा भी था। वे सागरमाथा ही थे। ऐसे अनूठे मालवीय जी भारत की प्राचीनता और आधुनिकता के बेजोड़ समन्वयकर्ता थे। वे उन महान विभूतियों में थे, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता का सपना देखा और उसे साकार करने के लिए पूरा जीवन लगा दिया। मात्र पच्चीस वर्ष की आयु में वे इतनी भरी-पूरी राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित थे कि कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में उन्हें प्रतिनिधियों को संबोधित करने का अवसर मिला। उनकी प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया गया। वह १८८६ की कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन था।
प्रस्तुत खण्ड में पं. मदनमोहन मालवीय के हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि विषयक निबन्धों, ज्ञापनों और भाषणों को कालक्रमानुसार संगृहीत किया गया है। मालवीयजी के जीवन के प्रारम्भिक काल में हिंदी के कई प्रतिष्ठित कवि और लेखक वर्तमान थे। जहाँ एक ओर राजा शिवप्रसाद सितार-ए-हिन्द (१८२४-१८९५) और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (१८५०-१८८५) की कीर्ति से हिंदी की दिशाएँ प्रकाशित हो ही रही थीं; वहीं दूसरी ओर कानपुर के पं. प्रतापनारायण मिश्र (१८५६-१८९४), प्रयाग के पं. बालकृष्ण भट्ट (१८४४-१९१४) और कालाकाँकर तथा बाद में कलकत्ते के बाबू बालमुकुन्द गुप्त (१८६५-१९०७) भी हिंदी की अनवरत सेवा कर रहे थे। परन्तु सरकारी कामकाज में उर्दू और फारसी के बढ़ते प्रभाव से मालवीयजी चिन्तित थे। सन् १८८४ में इलाहाबाद में 'हिंदी-उद्घारिणी-प्रतिनिधि-मध्य-सभा' का जन्म हुआ। इसका उद्देश्य नागरी को उसका अधिकार दिलाना था। मालवीयजी ने इसमें बड़ी लगन से काम किया। व्याख्यान दिए, लेख लिखे और और अपने मित्रों को भी इस काम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।' सन् १८९३ में बनारस में काशी नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। सन् १८९४ में मालवीयजी इससे जुड़ गये और हिंदी तथा देवनागरी लिपि के उन्नयन के लिए कार्य करने लगे। हिंदी-भाषा तथा देवनागरी लिपि को उसका अधिकार दिलाने में पं. मदनमोहन मालवीय का योगदान अविस्मरणीय है। इस योगदान को जानने के लिए हिंदी और देवनागरी-आन्दोलन की पृष्ठभूमि को चरणबद्ध तरीके से जानना श्रेयस्कर होगा।
हिंदी-आन्दोलन की उत्पत्ति सन् १८६० के बनारस आन्दोलन से मानी जा सकती है, जिसे बाद में १८६८ में 'मेमोरेण्डम कोर्ट कैरेक्टर्स इन द अपर प्रोविंसेस ऑफ़ इण्डिया' में राजा शिवप्रसाद सितार-ए-हिंद ने यह तर्क दिया कि उर्दू और फारसी के प्रयोग से पश्चिम प्रान्त एवम् अवध में हिंदी के विकास और प्रारम्भिक शिक्षा का ह्रास हो रहा है। इस पर्चे में हिंदी का प्रयोग देवनागरी के पर्याय के रूप में हुआ था। अन्त में शिवप्रसाद ने यह अपील की थी कि 'फारसी शब्दों को कोर्ट से निकालकर हिंदी का प्रयोग हो।' सन् १८७३ में इसी प्रकार का ज्ञापन उत्तर-पश्चिम प्रान्त के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर विलियम म्योर (१८६८-१८७४) को दिया गया। इसमें तर्क दिया गया था कि फ़ारसी इस देश के लिये विदेशी भाषा है और इसे सामान्य जन नहीं पढ़ सकते। इसलिये कचहरियों और दफ्तरों में हिंदी या देवनागरी का प्रयोग हो जो जनसामान्य की भाषा है। इस ज्ञापन में यह कहा गया कि मुसलमान जनसंख्या शायद इसे पसन्द न करे, पर यह परिवर्तन बहुसंख्यक हिंदुओं के हित में होगा। जनवरी १८७४ में सरकार ने यह उत्तर दिया कि वह यथावसर भली-भाँति विचार करेगी।
हिंदी और देवनागरी-आन्दोलन को सन् १८८४ में उत्तर प्रान्तों में तब बल मिला जब देवनागरी लिपि को बिहार में सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में मान्यता देनी पड़ी। सन् १८८२ में जब विलियम हण्टर की अध्यक्षता में शिक्षा के विकास की समीक्षा के लिये आयोग गठित हुआ तथा उसे यह भी अधिकार था कि भाषा-सम्बन्धी नीति में परिवर्तन की सिफारिश कर सके। इस आयोग के सम्मुख तमाम सम्मानित लोग गवाही के लिये उपस्थित हुए, जिनमें राजा शिवप्रसाद, भारतेन्दु हरिवन्द्र, सर सैयद अहमद खान (१८१७-१८९८) प्रमुख थे। देवनागरी लिपि एवं हिंदी-समर्थकों द्वारा इसके पक्ष में एक प्रभावी अभियान चलाया गया। आयोग के समक्ष ७६ स्मृति पत्र (मेमोरियल) प्रस्तुत किये गये जिसमें सम्पूर्ण प्रान्त से ५८, २८९ लोगों ने हस्ताक्षर किये थे। इन पत्रों में पुराने पर्चों के तर्क को दुहराते हुए शिक्षा आयोग से यह अनुरोध किया गया कि जनसमुदाय के हित में प्रान्त में देवनागरी सही एवम् उचित भाषा होगी।
नवम्बर सन् १८९४ में संयुक्त प्रान्त के लेफ्टिनेण्ट गवर्नर सर एंथोनी पैट्रिक मैक्डॉनल (१८९५-१९०१) काशी पधारे। बाबू श्यामसुन्दरदास के शब्दों में......(काशी नागरीप्रचारिणी) सभा ने उनको एक अभिनन्दन-पत्र देने का विचार कर उसके लिये आज्ञा मांगी। कोई उत्तर न मिला। जब सर एंटोनी साहब काशी पहुँच गए तो मैं नदेसर की कोठी में, जहाँ वे ठहरे थे, बुलाया गया। बनारस के कमिश्नर के रिश्तेदार ने मुझसे कहा कि यदि तुम्हारी सभा अभिनन्दन-पत्र देना चाहती है तो जाओ डेपुटेशन लेकर अभी आओ। मैंने कहा कि संध्या हो चली है। लोगों को इकट्ठा करने में समय लगेगा। यदि कल या परसों इसका प्रबन्ध हो सके तो हम लोग सहर्ष आकर अभिनन्दन-पत्र दे सकते हैं। उन्होंने कहा, यह नहीं हो सकता। मैं लौट आया और मुख्य मुख्य सभासदों से सब बातें कहीं। निश्चय हुआ कि अभिनन्दन-पत्र डाक से भेज देया जाय और सब बातें लिख दी जायें। ऐसा ही किया गया।"
उसके उत्तर में गवर्नर साहब के प्राइवेट सेक्रेटरी ने निम्नलिखित पत्र भेजा:
'His Honour has read the Address with interest. The substantial question referred to, i.e., the substitution of Hindi for Urdu as the official language of the court, is one on which His Honour cannot now express an opinion. He admits, however, that your representation deserves careful attention and this he will be prepared to give to it at some future suitable time."
(गवर्नर महोदय ने अभिनन्दन-पत्र रुचिपूर्वक पढ़ा। इसमें जिस मुख्य प्रश्न की चर्चा की गई है अर्थात् अदालती भाषा उर्दू की जगह हिंदी कर दी जाय, इस पर गवर्नर महोदय अपनी कोई सम्मति अभी प्रकट नहीं कर सकते। फिर भी वे यह अवश्य स्वीकार करते हैं कि सभा की प्रार्थना ध्यानपूर्वक विचार करने योग्य है और वे भविष्य में समुचित अवसर पर उस पर अवश्य विचार करेंगे।)'
दिसम्बर १८९५ में इलाहाबाद में भारती भवन पुस्तकालय के वार्षिकोत्सव पर जस्टिस नाक्स, जो उस उत्सव के सभापति थे, ने कहा कि यह अवसर है कि तुम लोगों को अदालतों में नागरी अक्षर के लिये उद्योग करना चाहिए। तुम्हें सफलता प्राप्त होने की पूरी आशा है। गवर्नर के ऊपर दिए उत्तर तथा जस्टिस नाक्स के कथन का प्रभाव पड़ा और पं. मदनमोहन मालवीय ने इस काम को अपने हाथ में लिया और उसी समय से नागरी लिपि के समर्थन में आँकड़े और दस्तावेज एकत्र करने लगे।
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