शरत्चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने इस लोकप्रिय उपन्यास में सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार किया है और पिटी-पिटाई लीक से हटकर सोचने को बाध्य किया है। शरत्चंद्र प्रेम के भी कुशल के चितेरे थे, इसलिए इसमें प्रेम एवं स्त्री-पुरुष संबंधों का भी सशक्त चित्त्रण हुआ है। प्रेम के पक्ष को रखने के साथ-साथ शरत्चंद्र ने वास्तव में पतिता, कुलटा, पीड़ित दबी-कुचली और प्रताड़ित नारी की पीड़ा को भी अपनी इस रचना में जीवंत स्वर दिया है। मध्यवर्गीय समाज का यथार्थ चित्न अंकित करके उन्होंने सिद्ध किया है कि वे आम पाठक के न केवल चहेते लेखक हैं, वरन् आम आदमी के जीवन-संघर्ष को ही अपने उपन्यास की कथावस्तु बनाया है।
शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार एवं लघु कथाकार थे। उनकी अधिकांश कृतियों में गाँव के लोगों की जीवनशैली, उनके संघर्ष एवं उनके द्वारा झेले गए संकटों का वर्णन है। इसके अलावा उनकी रचनाओं में तत्कालीन बंगाल के सामाजिक जीवन की झलक मिलती है। शरत्चन्द्र भारत के सार्वकालिक सर्वाधिक लोकप्रिय तथा सर्वाधिक अनूदित लेखक हैं। 16 जनवरी 1938 ई. को कलकत्ता में 62 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ।
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